सूखती गंगा, बढ़ती सिंधु: क्या भारत की जल सुरक्षा पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा?

आज, भारत की दो बड़ी नदियां नई कहानी कहती हैं। गंगा का पानी एक तरफ कम होता जा रहा है। दूसरी ओर, सिंधु नदी में पानी बढ़ रहा है। समाचार केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जिंदगी में सच है। इस बदलाव को आईआईटी गांधीनगर की एक नवीन अध्ययन ने स्पष्ट रूप से बताया है। रिसर्च के अनुसार, पिछले चार दशक में गंगा का बहाव 17% घट गया है। वहीं, सिंधु नदी का बहाव 8% बढ़ा है। यह परिवर्तन भारत की जल सुरक्षा को खतरा पैदा कर सकता है।

40 वर्षों का डेटा, चौंकाने वाले परिणाम

1980 से 2021 तक का डेटा आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने देखा। उनके पास भूजल, नदियों का बहाव, बारिश और सिंचाई के लिए पानी खींचने की सूचनाएं थीं। “अर्थ्स फ्यूचर” नामक एक जर्नल में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है।

रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि गंगा बेसिन जल्दी सूख रहा है। पिछले ४० वर्षों में गंगा का प्रवाह १७% घट गया है। यह एक बहुत बड़ा झटका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी तेज गिरावट पिछले 1,300 साल में कभी नहीं हुई है।

सिंधु बेसिन, दूसरी ओर, 8 प्रतिशत बढ़ा है। यानी एक नदी कमजोर होने पर दूसरी मजबूत होती है। यह विपरीत बदलाव है। यही चिंता का विषय है।

गंगा सूखने का क्या कारण है?

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। गंगा का जलस्तर क्यों घट रहा है?

वैज्ञानिकों ने दो महत्वपूर्ण वजह बताई हैं। पहला कारण है अधिक भूजल का उपयोग। सिंचाई के लिए किसान जमीन के नीचे से बहुत अधिक पानी निकाल रहे हैं। जमीन से पानी खींचने से नदियों का पानी भी कम हो जाता है।

बारिश की कमी दूसरा कारण है। कई स्थानों पर बारिश कम हुई है। जब बारिश कम होती है, तो नदियों में अधिक पानी नहीं आता।

इन दोनों कारणों ने मिलकर गंगा का बहाव कम हो गया है। और यह सिर्फ नदी नहीं है। इसका प्रभाव खेतों, नगरों और शहर तक पहुंच रहा है।

सिंधु में पानी बढ़ने का क्या कारण है?

सिंधु नदी की स्थिति कुछ अलग है। बर्फ और ग्लेशियर पिघलने से कुछ स्थानों में पानी बढ़ा है। साथ ही, बारिश का पैटर्न कुछ स्थानों पर बदल गया है। इससे नदी में अधिक पानी है।

लेकिन वैज्ञानिक संकेत देते हैं। यह सुधार हर समय नहीं हो सकता। ग्लेशियर भविष्य में अधिक तेजी से पिघलते रहे तो पानी भी कम हो सकता है।

इसलिए बढ़ता हुआ बहाव भी अच्छा नहीं है। यह भी मौसम बदलने का संकेत है।

करोड़ों लोग प्रभावित

भारत के बहुत से लोग गंगा बेसिन में रहते हैं। गंगा का पानी लाखों किसानों की खेती का आधार है। इस बेसिन से भी कई बड़े शहरों का पीने का पानी मिलता है।

पीने का पानी कम होगा अगर गंगा का पानी कम होता रहा। खेती पर प्रभाव पड़ेगा। बिजली बनाने वाले बांधों पर भी असर होगा।

बस इतना ही नहीं। हमारे देश की आस्था भी गंगा से जुड़ी है। यह केवल एक नदी नहीं है। यह संस्कृति और विश्वास है।

यही कारण है कि गंगा का सूखना सिर्फ पर्यावरणीय खबर नहीं है। यह भी एक आर्थिक और सामाजिक संकट की चेतावनी है।

जल सुरक्षा पर महत्वपूर्ण खतरा

भारत पहले से ही जल संकट से गुजर रहा है। गर्मियों में कई शहरों में पानी की कमी होती है। टैंकर से पानी लेना होगा।

जल संकट और गहरा सकता है अगर गंगा का बहाव कम होता है। पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। जनसंख्या बढ़ रही है। खेती को अधिक पानी चाहिए। उद्योगों को भी पानी चाहिए।

ऐसे में नदी में कम पानी होने पर सभी पर दबाव बढ़ेगा।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से कहा कि हमें पानी को अनंत और मुफ्त संसाधन मानने से बचना चाहिए। पानी बहुत कम है। और अगर हम इसे बचाएंगे नहीं, तो यह भविष्य में बहुत बड़ी समस्या पैदा कर सकता है।

अंतरराष्ट्रीय समझौते

भारत और पाकिस्तान सिंधु नदी से बहुत जुड़े हैं। यह सिंधु जल संधि है। यह समझौता दशकों से चल रहा है।

सिंधु में पानी की वृद्धि और गंगा में पानी की कमी इस संतुलन को बदल सकती है। पानी के बारे में भविष्य में नए प्रश्न उठ सकते हैं।

प्रोफेसर विमल मिश्रा ने कहा कि बदलते परिस्थितियों को देखते हुए जल समझौतों पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि वर्तमान में संकट है। लेकिन परिवर्तन बताते हैं कि हमें सावधान रहना चाहिए।

परीक्षण क्या बताता है?

यह अध्ययन एक हाई-रिजॉल्यूशन मॉडल का उपयोग करता है, जो इसे खास बनाता है। इसका अर्थ है कि वैज्ञानिकों ने जानकारी को बहुत बारीकी से देखा।

वे भूजल, बारिश, नदी और सिंचाई के लिए पंपिंग को देखते थे। इसे अक्सर अलग-अलग देखा जाता है। लेकिन इस बार सभी को मिलाकर समझा गया।

रिसर्च के अनुसार, नदियों और भूजल को अलग-अलग प्रणाली मानना समस्या को बढ़ा देगा। दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं। जब जमीन का पानी कम हो जाएगा, तो नदी भी कमजोर हो जाएगी।

क्या समाधान हैं?

यह सवाल अब सबसे महत्वपूर्ण है। क्या हम कर सकते हैं?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सिंचाई की प्रक्रिया बदलेगी। खेतों में पानी बचाने के उपाय अपनाने की जरूरत है। कम पानी में उगने वाली फसलों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसका नाम क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन है। यानी कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें चुनना।

भूजल का उपयोग भी नियंत्रित होना चाहिए। नियमों के बिना पानी निकालना घातक हो सकता है।

सरकार को मजबूत नियम बनाने की जरूरत है। व्यापारी, किसान और आम लोग सबको मिलकर काम करना होगा।

कल संकट कम होगा अगर हम आज कदम उठाएंगे।

जनता की भूमिका

सरकार सब कुछ नहीं कर सकती। जनता भी जिम्मेदार है।

घर में पानी बचाया जा सकता है। नल को बंद न छोड़ें। बारिश का पानी मिलाएं। पेड़ डालें। पानी को बर्बाद नहीं करना चाहिए।

छोटे-छोटे बदलाव बहुत कुछ बदल सकते हैं।

पानी का महत्व भी बच्चों को समझाना होगा। स्कूल जागरूकता बढ़ाना चाहिए। भविष्य सुरक्षित होगा अगर नई पीढ़ी समझदार होगी।

आगे की दिशा

यह गंगा और सिंधु की कहानी हमें सतर्क करती है। मौसम निरंतर बदल रहा है। पानी की स्थिति बदल रही है।

हम चाहें तो इसे नहीं देख सकते। लेकिन तब बड़ा नुकसान होगा। या फिर हम इस समय संभल सकते हैं।

विज्ञान ने हमें समय रहते बहुत कुछ बताया है। अब निर्णय हमारा है।

पानी को बचाएंगे? हमारे नदियों को जीवित रखेंगे? क्या हम अगली पीढ़ी को एक सुरक्षित भविष्य छोड़ेंगे?

सिंधु का बढ़ना और गंगा का सूखना एकमात्र खबर नहीं है। इसका संकेत है। एक सूचना है।

अब हम जागें। पानी को महसूस करें। और सही कार्रवाई करें।

जीवन है क्योंकि पानी है। और जीवन भी सूख जाएगा अगर नदियां सूख जाएं।