सऊदी अरब और यूएई में बढ़ता विवाद: यमन से सैनिकों की वापसी से क्या थमेगा तनाव?

सऊदी अरब और यूएई में बढ़ता विवाद: यमन से सैनिकों की वापसी से क्या थमेगा तनाव?

नवीनतम खाड़ी युद्ध की आहट

इन दिनों, खाड़ी के दो सबसे बड़े देशों, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) चर्चा में हैं। अब ये दो देश एक-दूसरे के मजबूत सहयोगी हैं।
यमन में चल रहे युद्ध से दोनों के बीच टकराव तेजी से बढ़ा है।

इस बार मामला इतना गंभीर हो गया कि सऊदी अरब ने यूएई को अपनी सेनाओं को यमन से 24 घंटे में हटाने की चेतावनी दी।

यूएई ने कुछ ही घंटों में अपने बचे हुए सैनिकों को वापस बुला लिया। इस निर्णय के बाद लोगों ने सोचा कि क्या ये तनाव अब खत्म हो जाएगा या कोई बड़ा राजनीतिक संकट आने वाला है।

यमन विवाद की शुरुआत

2015 से यमन में जंग जारी है।
ताकि वैध सरकार की मदद की जा सके, सऊदी अरब और यूएई ने एक गठबंधन बनाया।
हूती विद्रोहियों के खिलाफ दोनों देशों की सेनाएं लड़ रही थीं।

2019 में यूएई ने अपनी अधिकांश सेना को वहां से हटा दिया था।
उस समय मिशन पूरा हो गया था।
लेकिन यमन में कुछ सैनिक अभी भी “आतंकवाद विरोधी” थे।

यूएई ने अब कहा कि वे भी सैनिकों को वापस बुला रहे हैं।
यानी अब यमन में कोई सैन्य मिशन नहीं करेंगे।

सऊदी अरब ने स्पष्ट चेतावनी दी

जब सऊदी अरब ने संयुक्त अरब अमीरात पर गंभीर आरोप लगाए, तो असली तनाव शुरू हुआ।
रियाद ने कहा कि यूएई यमन के अलगाववादी संगठन, साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC), का समर्थन करता है।
सऊदी ने कहा कि यह संगठन सऊदी सीमा की ओर जा रहा है, जो उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा करता है।

यह भाषण बहुत कठोर था।
यहाँ तक कि सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के मुकल्ला बंदरगाह पर हवाई हमले किए।
उनका दावा था कि यूएई से आयातित हथियारों का हमला किया गया था।

सऊदी सरकार ने फिर स्पष्ट रूप से कहा, “यूएई 24 घंटे के भीतर अपनी सेना यमन से वापस बुलाए।
और वहां के किसी गुट को धन या सैन्य सहायता देना छोड़ दे।”

यूएई का उत्तर

यूएई ने इस दावा को तुरंत अस्वीकार कर दिया।
उसने दावा किया कि वह कभी सऊदी के खिलाफ कोई गुट नहीं उकसाया था।
उनका दावा था,

“यूएई सऊदी अरब की सुरक्षा और स्थिरता पर पूरी तरह निर्भर है।” उसके संप्रभु अधिकारों का हमें सम्मान है।”

यूएई ने कहा कि मुकल्ला बंदरगाह पर उतारी गई गाड़ियाँ उनके ही सैनिकों के लिए थीं।
“वह किसी यमनी गुट या संगठन के लिए नहीं थीं,” उन्होंने कहा।”

रक्षा मंत्रालय ने फिर कहा, “हम भी यमन में मौजूद अपने बचे सैनिकों को वापस बुला रहे हैं।” मिशन पूरा हो गया है।”

शत्रुता या रणनीतिक बदलाव?

अब सवाल उठता है कि क्या यह निर्णय सिर्फ अस्थायी शांति का प्रयास है या दोनों देशों के रास्ते वास्तव में अलग हो गए हैं।
सऊदी अरब और यूएई को खाड़ी क्षेत्र में एक साथ देखा गया था—
दोनों ने सुरक्षा, व्यापार और तेल नीति में गहरी सहयोग किया है।

लेकिन तेल उत्पादन नीति और भू-राजनीतिक प्रभाव जैसे मुद्दों पर हाल के वर्षों में विवाद बढ़ा है।
यूएई को क्षेत्र की स्वतंत्र शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
साथ ही, सऊदी अरब चाहता है कि वह खाड़ी में सबसे प्रभावशाली नेता बन जाए।

इसलिए, दोनों देशों के बीच अब धीरे-धीरे सत्ता संघर्ष सामने आ रहा है।

यमन: तीसरी पार्टी की चुनौती

यमन में पहले से ही मानवीय समस्याएं हैं।
इस तरह की बहस ने सऊदी और यूएई के बीच स्थिति अधिक जटिल बना दी है।

यमन की सरकार अब असमंजस में है।
यूएई अपने दक्षिणी क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सऊदी अरब उसकी वैधता का सबसे बड़ा समर्थक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यमन का युद्ध और भी लंबे समय तक चल सकता है अगर दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने लगें।

क्या युद्ध समाप्त हो जाएगा?

कई लोगों ने यूएई की सेना की वापसी को तनाव कम करने की कोशिश बताया है।
लेकिन कुछ अनुभवी लोगों का विचार है कि यह सिर्फ ऊपर से समझौता है।
असली मतभेद अभी भी बरकरार हैं—
खाड़ी, व्यापार और तेल में नियंत्रण बनाए रखना

यूएई ने यमन से वापसी का निर्णय “स्वेच्छा” से किया, लेकिन सऊदी की धमकी ने इसे प्रेरित किया।
क्या यह “दबाव में समझौता” होता है?
राजनयिकों का कहना है कि हां—
वर्तमान में, यूएई सीधे सैन्य संघर्ष से बचना चाहता है।

सऊदी-यूएई संबंधों पर प्रभाव

ये दोनों देशों को कभी खाड़ी की मजबूत जोड़ी कहा जाता था।
यमन या ईरान के सभी क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी नीतियां समान थीं।
लेकिन अब यह संबंध ठंडा हो गया है।

हाल ही में सऊदी अरब ने पर्यटन और आर्थिक परियोजनाओं को तेजी से बढ़ावा दिया है, जबकि यूएई को नए व्यापारिक केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
दोनों का प्रतिस्पर्धी व्यवहार भी रिश्तों पर प्रभाव डालता है।

यह संघर्ष बताता है कि खाड़ी की राजनीति में अब साथ-साथ रहने की जगह सत्ता हासिल करने की होड़ लग गई है।

सोशल मीडिया में बहस

सोशल मीडिया पर सऊदी अरब और यूएई के रिश्तों में आई इस गिरावट पर बहुत चर्चा हो रही है।
#SaudiUAEConflict और #YemenCrisis हैशटैग ट्विटर (X) पर ट्रेंड कर रहे हैं।
उपयोगकर्ताओं ने इसे “खाड़ी की ठंडी जंग” कहा है।

यूएई के नागरिकों की प्रतिक्रिया सामान्य है—
सेना की वापसी को कुछ लोगों ने “सही फैसला” बताया क्योंकि इससे जानें बचेंगी।
वहीं कुछ लोगों का विचार है कि इससे ईरान या हूती विद्रोहियों का प्रभाव क्षेत्र पर बढ़ सकता है।

दूसरी ओर, सऊदी लोगों का कहना है कि उनका देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सही कार्रवाई की है।

नेताओं की लोकप्रियता और प्रभावीता

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और यूएई के शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान (MBZ) दोनों बहुत प्रभावशाली राष्ट्रपति हैं।

दोनों को आज की अरब दुनिया का चेहरा बताया जाता है, क्योंकि उनकी बड़ी सोशल मीडिया उपस्थिति है।
2010 के दशक में, उनकी सहयोगी नीतियों ने खाड़ी देशों को एकजुट किया था।

लेकिन अब वही दिग्गज नेता अपने देशों के मूल्यों को विभिन्न दिशाओं में ले जा रहे हैं।
MBS सऊदी को “नया वैश्विक बिजनेस हब” बनाना चाहते हैं, जबकि MBZ यूएई को क्षेत्र की “स्वतंत्र ताकत” बनाना चाहते हैं।

इन अलग-अलग उद्देश्यों से ही युद्ध का यह नया अध्याय शुरू हुआ है।

दोनों देशों की वित्तीय शक्ति

दोनों की मजबूत आर्थिक स्थिति है।
सऊदी अरब विश्व में सबसे बड़े तेल भंडार है।
यूएई की अर्थव्यवस्था भी पर्यटन, व्यापार और तकनीक पर निर्भर है।

आंकड़ों के अनुसार इन देशों का “नेट वर्थ” खरबों में है।
पर भू-राजनीतिक संघर्ष से उनकी छवि धीरे-धीरे प्रभावित हो रही है।

निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ये खाड़ी दरार आर्थिक जोखिम को बढ़ा देंगे?

अब क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई और सऊदी अरब दोनों को तेल बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता की समान जरूरत है, इसलिए आने वाले महीनों में उनके संबंध फिर से सुधर सकते हैं।

लेकिन यमन की जंग ने उनके संबंधों को तोड़ दिया है।
दुनिया अब यह देख रही है कि क्या खाड़ी की ये दो प्रमुख शक्तियां फिर से मित्र बन जाएंगी या एक नई “ठंडी जंग” शुरू हो जाएगी।