सिंधु घाटी सभ्यता क्यों हुई खत्म? IIT गांधीनगर की रिसर्च से मिला जवाब

सिंधु घाटी सभ्यता क्यों हुई खत्म? IIT गांधीनगर की रिसर्च से मिला जवाब

भारत में कई बड़ी सभ्यताएँ हुईं और चली गईं, लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता का रहस्य हमेशा लोगों को आकर्षित करता है। यह विश्व की सबसे पुरानी और सबसे विकसित सभ्यताओं में से एक थी। लेकिन आखिर यह सभ्यता क्यों समाप्त हुई? यह सवाल हमेशा रहता है।

अब, IIT गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन से इस राज का पता लगाया है। उन्हें लगता था कि लंबे और निरंतर सूखे ने सिंधु घाटी सभ्यता को अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खत्म कर दिया।

सिंधु घाटी की सभ्यता का क्या स्वरूप था?

करीब 5,000 साल पहले, भारत और पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी भाग में सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे एक विशाल सभ्यता विकसित हो रही थी, जब दुनिया के कई हिस्से अभी भी छोटे जनसमूहों में बंटे हुए थे।

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी और लोथल में यह सभ्यता व्याप्त है। यहाँ के लोग कृषि करते थे, व्यापार करते थे और स्वच्छ शहर में रहते थे।

ईंटों से बने उनके घरों में नालियाँ और सबसे अच्छी जल निकासी व्यवस्था थी। साथ ही उनकी अपनी कला और लिपि भी थी— इसी सभ्यता की पहचान है प्रसिद्ध “नाचने वाली लड़की”, या डांसिंग गर्ल।

सभ्यता धीरे-धीरे समाप्त हो गई

यह पहले सोचा जाता था कि सिंधु घाटी सभ्यता एक दुर्घटना, भूकंप या युद्ध से समाप्त हो गई। लेकिन नवीनतम शोध कुछ अलग कहते हैं।

IIT गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा और उनकी टीम ने पत्रिका “Communications: Earth and Environment” में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। सभ्यता के दौरान चार बड़े सूखे पड़े।

हर सूखा आठ दशक से अधिक समय तक चला। सभ्यता का लगभग 90% हिस्सा 164 साल तक सूखा था।

क्यों सूखा हुआ?

शोधकर्ताओं ने पाया कि हजारों साल पहले इस क्षेत्र में बारिश लगातार कम होती जा रही थी। औसत वार्षिक वर्षा में १०-२०% की गिरावट हुई।

इसके अलावा, तापमान लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। इससे नदियों का जलस्तर कम हो गया, जिससे सिंधु नदी भी सूखने लगी।

पृथ्वी की जलवायु भी बदल गई— मानसून को अल नीनो की घटनाओं, महासागरों के तापमान और हवा के पैटर्न ने कमजोर कर दिया।

पानी पर निर्भर सभ्यता धीरे-धीरे ध्वस्त हो गई।

सूखे खेती पर प्रभाव

सिंधु घाटी के लोगों का जीवन खेती पर था। वे चने, गेहूं और जौ की फसलें उगाते थे। लेकिन फसलें नष्ट होने लगीं जब बारिश कम हुई और नदियाँ सूखने लगीं।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने खेती के तरीके को बदल दिया। वे कम पानी में भी फसलें उगाने लगे, जैसे बाजरा।

IIT गांधीनगर के शोधकर्ता हिरेन सोलंकी कहते हैं, “लोगों ने अपनी खेती पूरी तरह बदल दी।” अब उन्हें सूखे के हिसाब से जीना सीखना पड़ा।”

लेकिन जैसे-जैसे सूखा बढ़ा, बाजरा भी लंबे सूखे से बच गया। फिर लोग बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर छोटे-छोटे कस्बों और गाँवों में भागने लगे।

लोग कहाँ भाग गए?

लोगों को खेती करना मुश्किल हो गया जब नदी सूख गई।

हिरेन सोलंकी का कहना है कि पहले लोग पश्चिमी सभ्यता में रहते थे। फिर सूखा होने पर वे सिंधु नदी के किनारे आ गए।

जब हालात वहाँ भी खराब हो गए, कुछ लोग हिमालय की तलहटी की ओर चले गए, जहाँ ग्लेशियरों से अब भी पानी मिलता है। थोड़ी बहुत बारिश और व्यापार की सुविधा के कारण दूसरे लोग गुजरात के सौराष्ट्र की ओर चले गए।

सभ्यता इस तरह एक जगह से दूसरी जगह चली गई। लेकिन गायब नहीं हुई।

प्रशासन ने क्या किया?

शानदार प्रशासन और योजना सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्टता थी।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहर बहुत अच्छी तरह से बनाए गए थे। लेकिन निरंतर सूखे ने प्रशासन को भी कमजोर कर दिया।

हिरेन सोलंकी बताते हैं, “जब तीसरा और चौथा सूखा पड़ा, तो लोगों ने खुद जगह बदलनी शुरू कर दी।” अब किसी प्रशासन को इतने बड़े क्षेत्र का नियंत्रण करना संभव नहीं था।”

इसलिए छोटे-छोटे समुदायों में सभ्यता फैल गई। कोई संघर्ष नहीं हुआ, कोई बड़ा धमाका नहीं हुआ— सब कुछ पानी की कमी से बदल गया।

विज्ञान ने क्या संकेत दिए?

यह अध्ययन वैज्ञानिक आंकड़ों और ऐतिहासिक अनुमानों पर आधारित है।

IIT गांधीनगर की टीम ने “हाई-रिज़ॉल्यूशन जलवायु मॉडल” और “हाइड्रोलॉजिकल मॉडल” का उपयोग करके हजारों साल पुरानी बारिश और नदी बहाव को मापा।

उन्होंने मिट्टी के नमूनों, गुफाओं की परतों और झीलों के अवसादों का अध्ययन किया। इससे पता चला कि तीन हजार साल पहले इस क्षेत्र में मानसून कमजोर था।

“हर सूखा औसतन 85 वर्ष तक चला, और उनमें से कुछ 100 से 160 साल तक रहे,” उन्होंने कहा।”

सभ्यता, अचानक नहीं, धीरे-धीरे

विशेषज्ञों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन एक ही क्षण में नहीं हुआ था। यह एक लंबी और कठिन कार्रवाई थी।

पहले बारिश कम हुई, फिर नदियाँ सूखने लगीं, खेती कम हुई और लोग स्थान बदलने लगे।

शहर क्रमशः खाली होने लगा। लोगों ने छोटे-छोटे गाँवों में बस गया। व्यापार कम हुआ और अंततः यह महान सभ्यता बन गई।

यह, हालांकि, “अंत” नहीं था। हड़प्पा के लोगों ने नए स्थानों पर स्थानांतरित होकर नए तरीके से जीवन जीने लगे।

आज के युग में उपदेश

यह सिर्फ पुरानी कहानी नहीं है— आज भी यह एक चेतावनी है।

IIT गांधीनगर के प्रोफेसर मिश्रा का कहना है कि “सिंधु घाटी सभ्यता के लिए जो सूखा प्राकृतिक था, आज हम वैसा ही सूखा खुद पैदा कर रहे हैं।””

आज हमारे जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, भूजल तेजी से घट रहा है, और तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।

इतिहास फिर से शुरू हो सकता है अगर हम अपने पर्यावरण को समय रहते नहीं बचाते हैं।

भविष्य की उम्मीद

यह भी अध्ययन कहता है कि वर्तमान जलवायु परिस्थितियों में भारतीय मानसून के कुछ हिस्सों में बारिश बढ़ सकती है।

लेकिन इससे पहले हमें पानी की लागत का पता लगाना होगा। उस समय सभ्यता पानी के बिना नहीं चल सकती थी, और आज भी सभ्यता जलवायु और पानी पर निर्भर है।

इसलिए स्थायी खेती, वृक्षारोपण और जल प्रबंधन का ध्यान देना आवश्यक है।

उत्कर्ष

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन एक रहस्यमय दुर्घटना नहीं था। वह प्रकृति और इंसान के बीच का संबंध बताता था।

इंसान को झुकना पड़ा जब प्रकृति ने अपनी चाल बदली।

हाल ही में हालात कुछ अलग नहीं हैं। तकनीक और विज्ञान में इंसान ने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन वह अभी भी प्रकृति पर निर्भर है।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो हमें बताते हैं कि सभ्यताएँ सिर्फ तब टिकती हैं जब वे प्रकृति के साथ संतुलन में रहते हैं, न कि उसके खिलाफ।