चतुर्ग्रहीय योग में माघ मेले का शुभारंभ: श्रद्धा, आस्था और भक्ति से गूंजा त्रिवेणी तट
तीर्थराज प्रयाग में श्रद्धालुओं की भारी भीड़
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इस वर्ष माघ मेला एक बड़े ही शुभ संयोग में शुरू हुआ है, जो चतुर्ग्रहीय योग है। त्रिवेणी तट पर शनिवार की पौष पूर्णिमा के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। आधी रात से ही गृहस्थों, संतों, श्रद्धालुओं और कल्पवासियों ने संगम की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। कड़ाके की ठंड ने किसी को आश्वस्त नहीं किया। संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर आत्मिक मोक्ष और शांति पाना हर किसी का सपना था।
माघ मेला: तपस्या, तपस्या और त्याग का उत्सव
माघ मेला भारत का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है। यह मेला इस बार और भी खास है क्योंकि यह सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र के धनु राशि में एक साथ शुरू हुआ है। ज्योतिषाचार्यों ने यह योग बहुत शुभ माना है।
गृहस्थ इस महीनेभर चलने वाले मेले में अपने घर-परिवार से दूर रहकर, सुख-सुविधाओं का त्याग करके कल्पवास करते हैं। यह एक विशिष्ट उपकरण है—जहां हर दिन स्नान करना, जप करना, तप करना और ध्यान करना महत्वपूर्ण है श्रद्धालुओं का मानना है कि इससे पूर्वजों को शांति मिलती है और जन्म-जन्मांतर के पापों से छुटकारा मिलता है।
कल्पवास का पवित्र रिवाज
इस बार भी संगम की रेती पर हजारों गृहस्थ और संत अपने शिविरों में बस गए हैं। ये शिविर साधनों से नहीं, बल्कि साधना से भरे हैं।
सुबह-सुबह कल्पवासी संगम में स्नान करते हैं, फिर दिन भर जप-तप और सेवा में लीन रहते हैं। वे दिन को खुले आसमान के नीचे बिताते हैं, मिट्टी से बने चूल्हों पर खाते हैं और रात को कीर्तन-भजन में डूब जाते हैं।
माघ मेला सिर्फ एक उत्सव नहीं है; यह आत्मशुद्धि, आस्था और अनुशासन का संगम है।
सामयिक स्नान: आत्मिक खुशी का क्षण
शनिवार तड़के संगम तट पर लोगों की भीड़ उमड़ी। लोगों ने घने कोहरे और ठंड में भी पूजा की।
एक श्रद्धालु ने मुस्कुराते हुए कहा, “कड़ाके की ठंड महसूस नहीं होती जब मन में भक्ति की आग जल रही हो।”
इस पवित्र स्नान में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग सब शामिल थे। इससे माघ मेला की औपचारिक शुरुआत हुई।
15 फरवरी तक श्रद्धा का समय
इस बार बहुत से लोग महाशिवरात्रि (15 फरवरी) तक भजन करेंगे। शहर भर में श्रद्धा का वातावरण होगा।
संगम के पवित्र जल में स्नान कर, संत और गृहस्थ दोनों कल्पवास शुरू करते हैं। हिंदू धर्म में पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक का समय बहुत शुभ माना जाता है।
पहली बार सात क्षेत्रों में मेला
इस बार मेला और भी बड़ा और व्यवस्थित बनाया गया है। सात सेक्टर में पहली बार मेला बसाया गया है। पहले मेल सिर्फ पांच क्षेत्रों में था।
यह विस्तार किया गया है ताकि श्रद्धालुओं को असुविधा न हो और भीड़ को अलग-अलग स्थानों में बांटा जा सके।
सुरक्षा और प्रशासन: कड़ी व्यवस्था
इस बड़े मेले में सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। इस बार प्रशासन ने ड्रोन निगरानी प्रणाली, 400 सीसीटीवी और AI-सक्षम कैमरों की मदद से भीड़ और यातायात पर नियंत्रण रखा है।
मेले में 17 थाने, 42 पुलिस चौकियां और 20 अग्निशमन स्टेशन हैं। ताकि स्नान क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित रहे, 8 किलोमीटर लंबी डीप वाटर बैरिकेडिंग भी बनाई गई है।
सुविधाओं की व्यापक पूर्वयोजना
प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा और आराम को ध्यान में रखते हुए 16 स्नान घाटों का प्रबंध किया है। शुक्रवार तक इन घाटों की मरम्मत और सफाई पूरी हो गई थी।
प्रकाश व्यवस्था, सफाई दल और भीड़ नियंत्रण बैरिकेड्स घाटों पर लगाए गए हैं। साथ ही चालीस दो अस्थायी पार्किंग स्थल भी बनाए गए हैं, जिनमें 1.30 लाख वाहनों को खड़ा करने की क्षमता है।
इस तरह की तैयारियां बताती हैं कि माघ मेला एक व्यापक प्रबंधन का उदाहरण है और एक धार्मिक समारोह भी है।
तकनीक से भीड़ पर नजर
मेला प्रशासन ने इस बार भी सुरक्षा और सफाई व्यवस्था में नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल किया है।
AI युक्त कैमरे क्राउड मापन, क्राउड डेंसिटी एनालिसिस और इंसीडेंट रिपोर्ट करते हैं।
तुरंत अलर्ट मिलता है, जिससे पुलिस और प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता मिलती है अगर क्षेत्र में भीड़ अधिक होती है।
इससे मेले का प्रबंधन अधिक व्यवस्थित और सक्षम होता है और लोग सुरक्षित रहते हैं।
सड़कों और परिवहन व्यवस्था
भक्तों की बढ़ती आबादी को देखते हुए यातायात व्यवस्थाओं में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
ताकि कोई आपातकालीन परिस्थिति न हो, ट्रैफिक डायवर्जन योजना बनाई गई है और सड़कों को साफ किया गया है।
अंतर-राज्यीय और स्थानीय समन्वय ने करीब 50 लाख लोगों को मेला स्थल तक बिना किसी बाधा या असुविधा के पहुंचाया है।
प्रेम और सामाजिक समन्वय का प्रतीक
माघ मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है—यह भी भारत की विविधता और एकता का जीवंत चित्र है।
देश भर से लोग यहां आते हैं—शांति और आस्था की खोज, विभिन्न भाषाओं, परंपराओं और कपड़े पहने हुए।
इस संगम में भारत की आत्मा झलकती है—जहां मानवता, धर्म और संस्कृति एक ही धारा में बहते हैं
मेला में भक्ति स्वर
जब शाम हो जाती है, पूरा त्रिवेणी तट दीपों की रोशनी और भजनों की आवाज से भर जाता है।
हर शिविर में भगवान का नाम जयकार होता है। गृहस्थ आत्मा को शांत करने के लिए साधु-संत उपदेश दे रहे हैं और गायत्री मंत्र जाप कर रहे हैं।
यह दृश्य न सिर्फ धार्मिक है, बल्कि भावनात्मक भी है—हर चेहरा खुशी से भरपूर है।
स्वच्छता और पर्यावरण
इस बार मेला प्रशासन स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष जोर दे रहा है।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर सेक्टर में मोबाइल टॉयलेट, सफाई गश्ती टीमों और कचरा प्रबंधन दल लगाए गए हैं।
“पर्यावरण संगम—स्वच्छता संगम” इस वर्ष मेले की थीम है।
भविष्य की प्रेरणा
हर साल माघ मेला आस्था का केंद्र बनता है, लेकिन इस बार आयोजन और प्रबंधन ने मिसाल कायम की है।
भविष्य में यह कार्यक्रम पर्यटन, संस्कृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक होगा, न केवल पूजनीय।
यह यात्रा हर श्रद्धालु के लिए आत्म-विकास की एक यात्रा बन जाती है।