आख़िरी आठ मिनट और एक बड़ा सवाल: क्या अजित पवार का विमान हादसा टल सकता था?

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के विमान हादसे की खबर ने पूरे देश को हिला दिया। इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या इसे रोका जा सकता था या नहीं। क्या बेहतर सुविधाएं बारामती की हवाई पट्टी पर कुछ अलग परिणाम देतीं? परीक्षण अभी जारी है, लेकिन प्राप्त जानकारी हमें विमान की लैंडिंग, मौसम और सुरक्षा के महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर दिलाती हैं। यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं है, बल्कि उड़ान के अंतिम आठ मिनटों की है जो सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।

हादसे के बाद उठने वाले प्रश्न

हादसे के बाद, बारामती की हवाई पट्टी पर सुरक्षित लैंडिंग के लिए आवश्यक सुविधाएं नहीं थीं। यदि सही सिस्टम और तकनीक मौजूद होते, तो पायलट को बेहतर मदद मिल सकती है। इसलिए लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह हादसा रोका जा सकता था?

बारामती हवाई पट्टी की योजना और विकास

लंबे समय से अजित पवार बारामती की हवाई पट्टी को लेकर चिंतित थे। वे चाहते थे कि यह आधुनिक हो। इसके लिए उन्होंने कई मुलाकातें भी कीं। रिपोर्टों के अनुसार, जुलाई में महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट कंपनी ने इस हवाई पट्टी पर अधिकार पाया था। पहले एक निजी कंपनी ने इसका प्रबंधन किया था, जिसमें कई कमियां बताई गईं।

अधिकारियों ने बताया कि अजित पवार ने खुद हवाई पट्टी को सुधारने का प्रस्ताव रखा था। उन्हें बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता थी, जैसे नाइट लैंडिंग, रनवे लाइट्स और एयर ट्रैफिक कंट्रोल। किसी भी छोटे या बड़े एयरपोर्ट में ये सुविधाएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

एयर ट्रैफिक नियंत्रण की कमी

रिटायर्ड पायलट एहसान ख़ालिद ने बताया कि बारामती में पर्याप्त एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम नहीं होना है। एयर ट्रैफिक कंट्रोलर पायलट को ज़मीन पर मौसम और विज़िबिलिटी की जानकारी देता है। अगर ऐसा सिस्टम नहीं है, तो पायलट को अपनी आंखों पर भरोसा करना होगा।

हादसे के समय पायलट की आंखों पर सूरज की रोशनी पड़ी हुई थी। ऐसी स्थिति में यह समझना मुश्किल होता है कि विमान सही दिशा में है या नहीं। जोखिम कई गुना बढ़ जाता है जब कोई अनुभवी कंट्रोलर नहीं है।

अनियंत्रित एयरोड्रम क्या है?

बारामती की हवाई पट्टी “अनकंट्रोल्ड एयरोड्रम” है। इसका अर्थ है कि आम एयरपोर्ट की तरह सुविधाएं यहां नहीं हैं। यहां नवीनतम लैंडिंग सिस्टम और नियमित एयर ट्रैफिक कंट्रोल नहीं हैं। मुख्यतः इस हवाई पट्टी का उपयोग फ्लाइंग ट्रेनिंग के लिए किया जाता था।

तैयार पायलटों का कहना है कि कॉकपिट में नेविगेशन में कोई खास सहायता नहीं मिलती। पायलट बाहर देखकर ही निर्णय लेना चाहिए। वहां मौसम की सटीक जानकारी देने वाला कोई विशेषज्ञ भी नहीं है।

रनवे नहीं, सुविधाएं

कुछ लोगों का मानना है कि रनवे छोटा होने से हादसा हुआ। लेकिन इससे विशेषज्ञ सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि इस तरह के विमान के लिए रनवे की लंबाई सही थी। रनवे से पहले विमान को सही दिशा नहीं मिली, जो मूल समस्या थी।

पायलट को सही दिशा और ऊंचाई का अनुमान लगाया जा सकता था अगर वहां इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम या GPS आधारित गाइडेंस था। इससे दुर्घटना की आशंका बहुत कम होती है।

इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम की आवश्यकता क्यों है?

इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) एक रेडियो सिस्टम है जो विमान को सुरक्षित रनवे पर उतारने में मदद करता है। यह सिस्टम पायलट की आंखों पर काम करता है जब धुंध, बारिश या अंधेरा होता है। यह विमान की स्पीड और रनवे के बीच में है या नहीं बताता है।

यह सिस्टम बारामती की छोटी हवाई पट्टी पर नहीं था। विशेषज्ञों का मत है कि पूरी तरह विकसित एयरपोर्ट पर यह सुविधा उपलब्ध होती है। लेकिन वर्तमान में जीपीएस आधारित सिस्टम सबसे सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प बन रहे हैं।

जीपीएस आधारित प्रणालियों की भूमिका

एहसान ख़ालिद ने कहा कि जीपीएस की मदद से दुनिया के कई हिस्सों में सुरक्षित लैंडिंग होती है। इसके लिए जमीन पर भारी उपकरण नहीं लगाना होगा। अफ्रीका भी इसका इस्तेमाल करता है। ऐसा सिस्टम बारामती पर होता तो पायलट को बेहतर जानकारी मिलती।

अंतिम आठ मिनट महत्वपूर्ण क्यों हैं?

“क्रिटिकल 11 मिनट” का नियम विमानन क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय है। इसमें टेकऑफ के तीन मिनट और उतरने से पहले आठ मिनट शामिल हैं। इन समय में विमान सबसे अधिक जोखिम में है।

मिनटों में पायलट का पूरा ध्यान सिर्फ उड़ान पर है। किसी भी बातचीत या ध्यान भटकाने वाली बात से बचा जाता है। आंकड़ों से पता चलता है कि अधिकांश हादसे इसी समय होते हैं।

आंकड़े बताते हैं

International Air Transport Association ने बताया कि आधे से अधिक विमान हादसे लैंडिंग के दौरान होते हैं। टेकऑफ के बाद भी कुछ दुर्घटनाएं होती हैं, लेकिन वे दुर्लभ हैं। यह स्पष्ट है कि लैंडिंग सबसे संवेदनशील समय है।

लैंडिंग के दौरान जोखिम क्यों बढ़ता है?

लैंडिंग करते समय खराब मौसम सबसे मुश्किल होता है, रिटायर्ड पायलट ख़ालिद हुसैन कहते हैं। ऊंचाई पर विमान से टकराने का खतरा कम होता है। लेकिन नीचे आते समय आपको रनवे, इमारतें और अन्य बाधाएं मिलती हैं।

हर समय पायलट को सतर्क रहना होगा। थोड़ी सी भूल भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।

जांच रिपोर्ट प्रतीक्षा करें

कैप्टन एम आर वाडिया ने कहा कि अभी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मूल कारण स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन विमान की क्षमता बहुत बुरी नहीं बताई गई, फिर भी विमान सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाया।

उत्कर्ष

अजित पवार की घटना ने कई प्रश्न उठाए हैं। यह हमें याद दिलाता है कि विमानन सुरक्षा में छोटी-छोटी बातें भी बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। बेहतर तकनीक, सही प्रशिक्षण और मजबूत सिस्टम शायद कई जीवनों को बचाने में सक्षम हैं। अब सबका ध्यान जांच रिपोर्ट पर है, जो पिछले आठ मिनटों में क्या हुआ, जो इतिहास बदल गया।