भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA (मुक्त व्यापार समझौता) चर्चा में है। कोई “ऐतिहासिक समझौता” नहीं है, लेकिन कोई इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहता है। सरकार का विचार है कि इससे यूरोप और भारत दोनों को लाभ होगा। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साझा समृद्धि का एक नया तरीका बताया है। लेकिन सवाल यह भी है कि आम लोगों, कारोबारियों और किसानों के लिए यह समझौता क्या लाएगा। इस विषय पर विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं।
भारत-ईयू एफटीए क्या है?
FTA का अर्थ है मुक्त व्यापार समझौता। इसका अर्थ है कि दो देशों या समूहों को आपस में व्यापार करना आसान हो जाता है। कम कर लगाए जाते हैं। नियम साधारण हैं। ऐसा ही भारत और यूरोपीय संघ ने किया है। यूरोपीय संघ, जिसमें 27 देश हैं, एक बड़ा बाजार है।
दोनों का क्या बल है?
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक यूरोपीय संघ है। उसका जीडीपी लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर है। इसके सबसे बड़े देशों में जर्मनी, फ्रांस और इटली शामिल हैं। भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। विश्व बैंक ने भारत को विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया है। भारत की अर्थव्यवस्था पिछले २५ वर्षों में कई गुना बढ़ गई है। कुल मिलाकर, दोनों करीब दो अरब लोगों को प्रभावित करते हैं।
वर्तमान व्यापार
भारत और यूरोपीय संघ ने 2024–25 में सामान का व्यापार 136 अरब डॉलर से अधिक का किया। 83 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार भी हुआ था। यह आंकड़े बताते हैं कि दोनों पहले से ही कारोबारी साथी हैं। एफटीए से इस संबंध को और मजबूत बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
बातचीत का रास्ता
2007 में यूरोपीय संघ और भारत ने FTA पर चर्चा शुरू की थी। लेकिन 2013 में यह कई कारणों से रुक गया। 2022 में इसे फिर से शुरू किया गया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि फरवरी 2025 के बाद असली तेज काम शुरू हुआ। इसके बाद दोनों पक्ष एक निष्कर्ष पर पहुंचे।
इस समझौते में शामिल क्या है?
सरकार का कहना है कि समझौते के बाद भारत की 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात यूरोप में खास छूट से जा सकेगी। इसमें कपड़ा, चमड़ा, जूते, समुद्री सामान, गहने, हस्तशिल्प और वाहन शामिल हैं। इन क्षेत्रों को इससे बड़ा बाजार मिलेगा। रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
यूरोप को क्या प्राप्त होगा?
यूरोपीय संघ भी बहुत लाभ उठाता दिखता है। उसकी 96 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर लगने वाला टैक्स धीरे-धीरे कम हो जाएगा या कम हो जाएगा। यूरोप ने कहा कि 2032 तक उसका भारत निर्यात दोगुना हो सकता है। कारों पर अत्यधिक टैक्स कम होगा। कुछ सालों में कार के पुर्जों पर टैक्स पूरी तरह से खत्म हो सकता है।
क्या सभी विवरण शामिल हैं?
नहीं है। यह समझौता सभी बातों पर लागू नहीं होता। भारत ने पोल्ट्री, डेयरी, अनाज और कुछ फल-सब्जियों को इससे बाहर रखा है। इसका अर्थ है कि यूरोप इन चीजों को भारत में आसानी से नहीं बेच सकेगा। वहीं चीनी, बीफ, चिकन और चावल जैसे उत्पादों को यूरोपीय संघ ने समझौते से बाहर रखा है। दोनों ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है।
यह एफटीए कब लागू होगा?
समझौते पर सहमत होना एक बात है, और उसे लागू करना दूसरी बात है। यूरोपीय संघ को पूरे दस्तावेज को सभी भाषाओं में अनुवादित करना होगा। फिर उसका विश्लेषण होगा। भारत को भी अंतिम अनुमोदन देना होगा। एफटीए 2027 की पहली छमाही तक लागू हो सकता है, पूर्व राजनयिक डॉ. मोहन कुमार का मानना है कि यह प्रक्रिया समय लेगी।
क्या आपकी चिंताएं हैं?
हर बड़े सौदे के साथ कुछ समस्याएं आती हैं। यह समझौता भारत-यूरोपीय संबंधों को मजबूत करेगा, लेकिन कुछ अधूरे मुद्दे हैं, कहते हैं ट्रेड विशेषज्ञ अजय श्रीवास्तव। इनमें सीबीएएम (यूरोपीय कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) सबसे बड़ा मुद्दा है।
CBEAM क्या है?
CBEAM यूरोपीय संघ का एक नियम है। इसके परिणामस्वरूप कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादों पर अधिक टैक्स लगाया जाता है। यह टैक्स यूरोप से आयातित वस्तुओं पर लागू होता है। मकसद है कम से कम पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना। लेकिन भारत में एल्यूमिनियम और स्टील जैसे उद्योगों पर इसका असर हो सकता है।
भारत को क्या चिंता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप से आने वाले सामान भारत में कम टैक्स पर आएंगे, लेकिन यूरोप से निर्यात करने वाले भारतीयों को कार्बन टैक्स देना पड़ेगा। इससे स्थिरता बिगड़ सकती है। कांग्रेस पार्टी ने भी इसे उठाया है और कहा है कि भारतीय उद्योगों को राहत दी जाएगी।
सरकार का उत्तर
भारत तकनीकी बातचीत करेगा, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा। इसका उद्देश्य है कि सीबीएएम के बावजूद भारतीय कंपनियां यूरोपीय बाजार में प्रवेश कर सकें। पीयूष गोयल ने दूसरी ओर विपक्ष के बयान को निराशाजनक बताया है।
आम लोगों के लिए इसका क्या अर्थ है?
भारत में बहुत कुछ सस्ता हो सकता है अगर यह समझौता सही तरह से लागू होता है। यूरोपीय गाड़ियां और मशीनें सस्ती हो सकती हैं। वहीं भारत से निर्मित जूते, गहने और कपड़े यूरोप में अधिक खरीद सकते हैं। इससे अधिक रोजगार की उम्मीद है।
उत्कर्ष
India-EUFTA एक महत्वपूर्ण प्रगति है। दोनों के संबंध इससे नए स्तर पर जा सकते हैं। इसमें चुनौतियां और मौके भी हैं। आने वाले वर्षों में पता चलेगा कि यह समझौता कितनी उम्मीदें पूरी करता है। फिलहाल, दुनिया भर में बदलते व्यापार वातावरण में भारत और यूरोप एक-दूसरे के अधिक करीब आना चाहते हैं।