संघ के भीतर चुनाव की कहानी: RSS में पदाधिकारी कैसे चुने जाते हैं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर कई प्रश्न उठते हैं। यह संस्था कैसे काम करती है? इसके नेता कौन हैं? चुनाव होते भी हैं? साथ ही, सह कार्यवाह और कार्यवाह के शब्दों का अर्थ क्या है? संघ ने 100 वर्ष पूरे किए हैं। अब यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। लेकिन आज भी यह बहुत शांत, आसान और नियंत्रित है। इस लेख में हम संघ का ढांचा और पदाधिकारी कैसे चुने जाते हैं।

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है?”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, या RSS, एक स्वयंसेवी संस्था है। इसकी शुरुआत बहुत न्यूनतम थी। पहली शाखा में सिर्फ पांच लोग थे। आज देश में पचास हजार से अधिक शाखाएं हैं। इन शाखाओं में लगभग नब्बे लाख स्वयंसेवक शामिल हैं।

RSS समाज को एकजुट करना, शासन करना और सेवा भावना को बढ़ाना चाहता है। संघ राजनीतिक संगठन नहीं है। इसमें कोई सदस्यता फॉर्म या सदस्यता शुल्क नहीं होता। किसी भी देशवासी शाखा में जाकर स्वयंसेवक बन सकता है।

“संघ का काम शाखा से चलता है।”

RSS का वास्तविक कार्य शाखा से शुरू होता है। शाखा पार्क, मैदान या खुला स्थान लगता है। वहां तय समय पर स्वयंसेवक मिलते हैं। संघ के गणवेश में सभी शामिल हैं। शाखा प्रार्थना से शुरू होती है। इसके बाद खेल, खेल और बातचीत होती है।

इस पूरी कार्रवाई को शाखा प्रमुख नियंत्रित करता है। यहाँ कोई बड़ा मंच नहीं है। सब कुछ सरल और स्पष्ट है। इसी से स्वयंसेवकों में अनुशासन और सेवा भावना आती है।

“संघ का मुखिया है भगवा ध्वज।”

RSS की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यहां कोई भी व्यक्ति मुखिया नहीं है। भगवा ध्वज को संघ का मुखिया माना जाता है। उसी से सभी निर्णय किए जाते हैं।

ध्वज को मुखिया मानने का उद्देश्य है कि संगठन एक व्यक्ति के आसपास न घूमे। इससे अहंकार और भ्रष्टाचार कम होते हैं। हर शाखा में ध्वज के सामने प्रार्थना और कार्यक्रम होते हैं।

“संघ सेवा में आगे रहता है”

संघ के स्वयंसेवक सिर्फ शाखा नहीं हैं। वे आपदा के समय बढ़-चढ़कर राहत और बचाव कार्यों में भाग लेते हैं। बाढ़, भूकंप या महामारी के दौरान स्वयंसेवकों की मदद करते हैं।

इसके अलावा, कई स्कूल, सेवा संस्थाएं और सामाजिक संस्थाएं भी संघ से जुड़े हुए हैं। ये संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, कर्मचारी और सामाजिक विषयों पर काम करती हैं। इन सबका उद्देश्य समाज की सहायता करना है।

“गुरु दक्षिणा से संघ चलता है।”

RSS गैर-लाभकारी है। इसे चलाने के लिए सरकारी धन नहीं मिलता। संघ विदेशी धन भी नहीं स्वीकारता। स्वयंसेवकों और समर्थकों का दान इसके खर्च को पूरा करेगा।

इस दान का नाम गुरुदक्षिणा है। साल में एक बार गुरुदक्षिणा होती है। लोग अपनी इच्छा से इसमें दान देते हैं। इसका कोई निश्चित मूल्य नहीं है। संघ प्रत्येक खर्च और आय का पूरा हिसाब रखता है। इससे पारदर्शिता रहती है।

“संघ का सर्वोच्च पद: सरसंघचालक।”

RSS का सर्वोच्च पद सरसंघचालक है। संघ का नेतृत्व सरसंघचालक करता है। वह संगठन का मार्गदर्शन करता है।

मोहन भागवत वर्तमान में संघ के सरसंघचालक हैं। संघ की प्रतिनिधि सभा सरसंघचालक को चुनता है। अब तक संघ के इतिहास में हर सरसंघचालक ने स्वयं अपने उत्तराधिकारी चुना है।

“सरकार्यवाह का क्या काम है?””

संघ का दूसरा सबसे बड़ा पद सरकार्यवाह है। यह पद संगठन का दैनिक कार्य देखता है। आप इसे जनरल सेक्रेटरी से तुलना कर सकते हैं।

हर तीन साल में सरकार्यवाह का चुनाव होता है। वह पूरे संगठन का नेतृत्व करता है और संघ की योजनाओं को लागू करता है। साथ ही, संघ के सभी प्रमुख पदाधिकारियों का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है।

तीन साल में चुनाव कैसे होते हैं?”

RSS में चुनाव बहुत शांत और व्यवस्थित होते हैं। यहां कोई पोस्टर या भाषण नहीं हैं। चुनाव जिला स्तर से शुरू होते हैं।

जिला और महानगर संघचालक पहले चुने जाते हैं। इसके बाद प्रांतीय और विभागीय संघचालक चुने जाते हैं। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक इसके बाद होती है।

“अहम प्रतिनिधि सभा बैठक”

प्रतिनिधि सभा की बैठक दो दिन चलती है। देश भर से कार्यवाह, प्रचारक और प्रतिनिधि इसमें भाग लेते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने काम का विवरण रखता है।

पहले दिन, बहस होती है। अगले वर्ष की कामकाज की चर्चा होती है। दूसरे दिन सरकार्यवाह तीन वर्षों की रिपोर्ट देते हैं। तब वे खुद घोषित करते हैं कि उनका कार्यकाल समाप्त हो गया है।

“सरकार्यवाह की नियुक्ति कैसे होती है?””

जब सरकार्यवाह मंच से उतर जाते हैं, केवल सरसंघचालक मंच पर रहते हैं। चुनाव के लिए पहले से चुनाव पदाधिकारी और पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाते हैं।

चुनाव पदाधिकारी सभा से सरकार्यवाह का नाम मांगते हैं। एक नाम के पीछे दूसरा नाम आता है। फिर पूछा जाता है कि क्या कोई और नाम है।

नया प्रधानमंत्री सर्वसम्मति से चुना जाता है अगर कोई और नाम नहीं आता। अब तक, संघ का हर प्रधानमंत्री सर्वसम्मति से चुना गया है।

“मतदान कौन करता है?””

प्रतिनिधि बैठक में भाग लेने के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं। हर पचास सक्रिय स्वयंसेवकों पर एक प्रतिनिधि है। फिर एक केंद्रीय प्रतिनिधि चुना जाता है, जो चालीस प्रांतीय प्रतिनिधियों पर निर्वाचित होता है।

इस प्रकार, लगभग दो हजार स्वयंसेवकों पर एक केंद्रीय प्रतिनिधि है। यही प्रतिनिधि सरकार्यवाह का चुनाव करते हैं।

“स्थिर और नियंत्रित चुनाव प्रणाली”

RSS का चुनाव प्रणाली बाकी संगठनों से अलग है। कोई शोर नहीं है। न तो प्रचार होता है और न ही विरोध होता है। सब कुछ मिलकर होता है।

यही कारण है कि संघ सौ वर्षों बाद भी अपने मूल सिद्धांतों पर अडिग है। यह सरलता, अनुशासन और सेवा भावना से अलग है।

उत्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरल ढांचा मजबूत भी है। नियम शाखा से सरसंघचालक तक हर स्तर पर लागू होते हैं। चुनाव पारदर्शी और शांत होता है।

संघ ने साबित किया है कि बड़े पैमाने पर संगठन बिना किसी प्रदर्शन के भी चल सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी ताकत यही है।