आयुष्मान योजना, देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में से एक, एक बार फिर चर्चा में है। इस कार्यक्रम के तहत गरीब और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क चिकित्सा मिलती है। लेकिन अब निजी अस्पतालों के लिए यही योजना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इलाज के बदले निजी अस्पतालों को पिछले लगभग पांच महीनों से कोई धन नहीं मिला है। इस दौरान बकाया लगभग 600 करोड़ रुपये हो गया है।
अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर भुगतान में देरी से परेशान हैं। आयुष्मान योजना के तहत इलाज को रोकने के लिए कई अस्पतालों ने स्पष्ट चेतावनी दी है। यह योजना उम्मीद की किरण बनी हुई गरीब मरीजों पर सबसे अधिक असर पड़ेगा।
आयुष्मान योजना और निजी अस्पताल
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना है। इस योजना में सरकारी और निजी अस्पताल शामिल हैं। निजी अस्पतालों की बड़ी संख्या मरीजों को आसपास इलाज देती है। जब सरकारी अस्पतालों में जगह नहीं होती, तो निजी अस्पताल ही सहारा होते हैं।
इलाज पहले निजी अस्पताल में किया जाता है, फिर सरकार इसका भुगतान करती है। अब यही व्यवस्था उन पर बोझ बन गई है। समय पर पैसा नहीं मिलने से अस्पतालों की दैनिक व्यवस्था खराब हो रही है।
पांच महीने से भुगतान नहीं मिला
निजी अस्पतालों का कहना है कि उन्हें पिछले लगभग पांच महीनों से कोई पैसा नहीं मिला है। इलाज जारी रहा, लेकिन भुगतान नहीं हुआ। इसके परिणामस्वरूप बकाया राशि बढ़ती चली गई। अब यह राशि लगभग 600 करोड़ रुपये हो गई है।
डॉक्टरों का कहना है कि इतने लंबे समय तक काम करना मुश्किल हो जाता है। हर महीने बिजली का बिल, दवा, कर्मचारी की सैलरी और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करनी होती हैं।
बैठकों में उठाया गया महत्वपूर्ण मुद्दा
निजी अस्पताल संघों ने इस मुद्दे पर बैठकें कीं। इस मुद्दे पर विभिन्न बैठकों में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया ने चर्चा की। इन बैठकों में डॉक्टरों ने खुलकर अपना असंतोष व्यक्त किया।
डॉक्टरों ने कहा कि भुगतान के अलावा कई और समस्याएं हैं। Biomedical West पर भारी यूजर चार्ज लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा, तकनीकी प्रक्रियाएं और कागजी काम बहुत जटिल हैं।
छोटे अस्पतालों पर सबसे अधिक प्रभाव
भुगतान में देरी का सबसे अधिक असर छोटे और मध्यम स्तर के अस्पतालों पर पड़ा है। छोटे अस्पताल खर्चों का सामना करना मुश्किल होता है, लेकिन बड़े अस्पताल ऐसा नहीं करते।
कई छोटे अस्पतालों के डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें कर्मचारियों को वेतन देने में भी परेशानी हो रही है। कुछ जगहों पर दवा खरीदने तक को रोकना पड़ा है। ऐसे परिस्थितियों में मरीजों को सही इलाज देना मुश्किल होता है।
भुगतान प्रक्रिया अभी भी मुश्किल है
डॉक्टरों का कहना है कि आज भी आयुष्मान योजना का भुगतान करना कठिन है। इलाज के बाद, फाइलों को अपलोड करना, दस्तावेजों को सही करना और मंजूरी का इंतजार करना होगा।
छोटी-छोटी गलतियों के कारण फाइल अक्सर अटक जाती है। फिर अस्पतालों को निरंतर सुधार की जरूरत है। इससे भुगतान देर से किया जाता है।
आठ साल की दरें परेशानी बन गईं
इलाज की लागत एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है। 2018 में प्रदेश में आयुष्मान योजना के तहत इलाज की दरें निर्धारित की गईं। इन दरों में पिछले आठ वर्षों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
इस समय सब कुछ महंगा हो गया है। दवा की लागत बढ़ी है। उपकरण और मशीनें महंगी हो गई हैं। पैरामेडिकल स्टाफ और नर्सों की सैलरी भी बढ़ानी पड़ी है।
महंगाई बढ़ी, खर्च बढ़ा
अस्पताल संस्थाओं का कहना है कि मौजूदा दरों पर उपचार अब संभव नहीं है। महंगाई निरंतर बढ़ती जा रही है। आयुष्मान योजना के दाम हर महीने बढ़ रहे हैं।
डॉक्टरों ने कहा कि वे मरीजों को मना नहीं करना चाहते, लेकिन नुकसान उठाकर इलाज करना भी मुश्किल है।
चिकित्सा रोकने की चेतावनी
निजी अस्पतालों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर 10 दिनों के भीतर भुगतान नहीं हुआ तो वे इलाज बंद कर सकते हैं। यह निर्णय मजबूरी से लिया जा सकता है।
डॉक्टरों ने कहा कि वे सरकार से संघर्ष नहीं करना चाहते। वे सिर्फ समय पर भुगतान और दरों में सुधार चाहते हैं।
मरीजों पर सीधा असर
आयुष्मान योजना के तहत उपचार देने से मरीज सीधे प्रभावित होंगे। यह सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोग गरीब और कमजोर होंगे।
सरकारी अस्पतालों में पहले ही भारी भीड़ है। मरीजों के पास अधिक विकल्प नहीं होंगे अगर निजी अस्पताल भी पीछे हटे।
सरकार से आशा
अस्पताल संगठन सरकार से जल्द समाधान की मांग करते हैं। उन्होंने दावा किया कि भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाया जाएगा। शेष राशि तुरंत भुगतान की जाए।
इसके साथ ही चिकित्सा खर्चों पर भी पुनर्विचार किया जाए। निजी अस्पताल मरीजों को लाभ देने वाली योजना से जुड़े रहेंगे अगर दरें बढ़ेंगी।
समाधान की आवश्यकता
आयुष्मान योजना गरीब लोगों को लक्षित करती है। निजी और सरकारी अस्पताल मिलकर काम करने से ऐसा संभव है। इसके लिए अस्पतालों की समस्याओं को जल्दी सुना जाना चाहिए।
भुगतान में देरी और पुरानी दरें अगर ऐसे ही बनी रहती हैं तो योजना पर संकट पैदा होगा।
उत्कर्ष
लाखों लोगों को आयुष्मान योजना से उपचार मिल गया है। लेकिन अब यह योजना स्वयं एक कठिन समय से गुजर रही है। 600 करोड़ रुपये का भुगतान अटक गया है।
चिकित्सा सेवाएं ठप हो सकती हैं अगर जल्द ही समाधान नहीं मिलता। डॉक्टर, मरीज और पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था इससे प्रभावित होगी। अब सरकार के अगले कदम पर सबका ध्यान है।