संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण खबर आई है। युनाइटेड अरब अमीरात ने इस्लामाबाद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा के संचालन से संबंधित समझौता खत्म कर दिया है। यह खबर हाल ही में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के भारत दौरे पर आई है। इसलिए इस निर्णय को भारत यात्रा से जोड़कर देखा जा रहा है।
पाकिस्तान ने हालांकि सफाई दी है। पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि यूएई के साथ इस्लामाबाद एयरपोर्ट को लेकर कभी कोई पक्का समझौता नहीं हुआ है। सरकार ने मीडिया को झूठ बोल दिया है। फिर भी, यह घटना ने पाकिस्तान, यूएई और भारत के संबंधों को फिर से चर्चा में ला दिया है।
इस्लामाबाद हवाई अड्डा विवाद में क्या हुआ?
पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने बताया कि यूएई ने इस्लामाबाद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ऑपरेशन की योजना को रद्द कर दिया है। इसका अर्थ है कि संयुक्त अरब अमीरात की कोई कंपनी इस एयरपोर्ट को अब नहीं चलाएगी।
पाकिस्तान ने कुछ महीने पहले कहा था कि यूएई अपने सबसे बड़े एयरपोर्ट को चलाने में मदद चाहता है। पाकिस्तान की खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने की कोशिश में यह कदम उठाया गया था। लेकिन अब यह योजना पूरी तरह से असफल हो गई है।
पाकिस्तान ने कहा कि “कभी डील हुई ही नहीं”
खबर सुनते ही पाकिस्तानी सरकार ने तुरंत कार्रवाई की। 24 जनवरी को पाकिस्तान ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात के साथ इस्लामाबाद एयरपोर्ट को लीज पर देने या चलाने पर कोई समझौता नहीं हुआ था। सरकार का कहना है कि मीडिया गलत है।
पाकिस्तान कहता है कि बातचीत हुई, लेकिन किसी पक्की डील पर हस्ताक्षर नहीं किए गए। इसलिए, डील को तोड़ने की बात कहना उचित नहीं है।
बातचीत छह महीने पहले शुरू हुई थी
असल में, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान ने अगस्त 2025 में इस्लामाबाद एयरपोर्ट को लेकर पहली बार चर्चा की थी। दोनों देशों में चर्चा हुई कि यूएई की कोई कंपनी एयरपोर्ट का प्रबंधन कर सकती है या नहीं।
ब्लूमबर्ग ने बताया कि यह बातचीत पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति से संबंधित थी। पाकिस्तान का विमानक्षेत्र लंबे समय से घाटे में है। सरकार चाहती थी कि विदेशी निवेश आए और एयरपोर्ट की सेवाएं बेहतर हों।
उस समय पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात के पास एयरपोर्ट चलाने का अच्छा अनुभव है। इस्लामाबाद एयरपोर्ट को अपनी एयरलाइंस और तकनीकी जानकारी से बेहतर बनाया जा सकता है।
भारत दौरे से मामला क्यों जोड़ा जा रहा है?
UAE के राष्ट्रपति के भारत दौरे को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है। 19 जनवरी को शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान अचानक भारत आए। उनकी यात्रा केवल एक दिन पहले घोषित की गई थी।
यह छोटा दौरा भी बहुत महत्वपूर्ण माना गया। राष्ट्रपति नाहयान ने भारत में लगभग दो घंटे बिताए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उन्हें ले गए। यह एक विशिष्ट संकेत माना गया था।
इस दौरान भारत और यूएई के बीच कई महत्वपूर्ण व्यापार, रक्षा और अन्य क्षेत्रों में समझौते हुए। कुल मिलाकर, नौ महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति हुई। इसलिए कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने कहा कि यूएई ने भारत के साथ बढ़ती नजदीकी के कारण पाकिस्तान वाली डील से हटाया।
लोकल पार्टनर एक बड़ी समस्या बन गया
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते के विफल होने की एक अतिरिक्त वजह सामने आई है। माना जाता है कि संयुक्त अरब अमीरात को पाकिस्तान में सही स्थानीय सहयोगी नहीं मिल रहा था। किसी भी बड़े परियोजना के लिए स्थानीय सहयोग आवश्यक है।
इस योजना को स्थानीय पार्टनर की खोज में भी देरी हुई। इससे यूएई ने सोचा कि इस काम में आगे बढ़ना मुश्किल होगा।
पाकिस्तान-यूएई संबंधों में बढ़ता तनाव
पाकिस्तान और यूएई के रिश्ते बहुत समय से मजबूत हैं। दोनों देशों के बीच कूटनीति, रोजगार और व्यापार में अच्छे संबंध रहे हैं। इसके बावजूद, पिछले कुछ महीनों में इन संबंधों में कमी आई है।
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ती नजदीकी इसका एक बड़ा कारण है। पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सितंबर 2025 में रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत, दोनों देश एक-दूसरे पर किसी भी हमला को हमला मानेंगे।
युनाइटेड अरब अमीरात इसे पसंद नहीं किया। युनाइटेड अरब अमीरात और सऊदी अरब पहले से ही कुछ मुद्दों पर विवाद कर रहे हैं। यही कारण है कि संयुक्त अरब अमीरात को पाकिस्तान के सऊदी के और करीब आने की चिंता हुई।
यमन विवाद का प्रभाव
यमन का गृहयुद्ध भी यूएई और सऊदी अरब के रिश्तों में तनाव का एक बड़ा कारण है। दोनों देशों ने यमन में विभिन्न गुटों का समर्थन किया है। उनके बीच की दूरी इससे बढ़ी है।
हाल ही में, सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में यूएई समर्थित अलगाववादी संगठनों के ठिकानों पर हमले किए। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात को वहां से अपनी सेना हटानी पड़ी। पूरे घटनाक्रम ने खाड़ी देशों की राजनीति पर प्रभाव डाला है।
इससे पाकिस्तान-यूएई संबंधों पर भी प्रभाव पड़ा है। अब यूएई भारत के साथ अपने रक्षा और आर्थिक संबंधों को बढ़ा रहा है। पाकिस्तान भी सऊदी अरब और तुर्किस्तान के करीब आ रहा है।
नवीन सुरक्षा कानून और यूएई की चिंता
समाचारों के अनुसार, तुर्किस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब जनवरी 2026 में एक और रक्षा समझौता कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यूएई एक और बड़ी चुनौती हो सकती है।
इस बदलते परिदृश्य में यूएई अपने हितों को बचाने के लिए नए सहयोगी खोज रहा है। भारत अब यूएई का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साथी बन गया है।
इस्लामाबाद अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट की खासियत
पाकिस्तान का सबसे बड़ा और नवीनतम हवाई अड्डा इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। यह देश की राजधानी का प्रमुख विदेशी गेटवे है। यह पहले बेनजीर भुट्टो इंटरनेशनल एयरपोर्ट था।
2007 में इस एयरपोर्ट का निर्माण शुरू हुआ था। 2018 में, करीब ग्यारह वर्ष बाद, इसका संचालन शुरू हुआ। इस परियोजना पर लगभग ९० अरब रुपये खर्च हुए थे। यह इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पाकिस्तान में सबसे महंगी है।
अंतरराष्ट्रीय और घरेलू यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एयरपोर्ट की डिजाइन की गई है।
हर दिन कितनी उड़ानें हैं?
इस्लामाबाद एयरपोर्ट से हर दिन लगभग चालीस से पच्चीस उड़ानें होती हैं। इनमें विदेशों और देश के बड़े शहरों के लिए फ्लाइट्स भी शामिल हैं।
यहाँ से लाहौर, पेशावर और कराची के लिए नियमित उड़ानें हैं। इसके अलावा, मध्य ईस्ट, यूरोप और एशिया के कई देशों में सीधी फ्लाइट्स भी हैं। इसलिए इस एयरपोर्ट का संचालन किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पाकिस्तान ने भी PIA बेची
पाकिस्तान ने अपनी सरकारी एयरलाइन, पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) को बेच दी है, जो उसकी आर्थिक स्थिति को स्पष्ट करता है।
23 दिसंबर को PIA का अधिग्रहण हुआ था। सरकार ने इसमें 75% हिस्सेदारी बेचने का निर्णय लिया। PIA को आरिफ हबीब ग्रुप ने लगभग 4320 करोड़ रुपये में खरीदा। सरकार ने सिर्फ २५ प्रतिशत हिस्सा हासिल किया।
PIA पिछले कई सालों से घाटे में रहा है। उस पर बहुत सारा कर्ज था। इसे बेचने की पहले भी कोशिश की गई थी, लेकिन सही दाम नहीं मिल पाया।
क्या होगा?
युनाइटेड अरब अमीरात और पाकिस्तान के बीच इस एयरपोर्ट डील का रुकना सिर्फ एक व्यावसायिक निर्णय नहीं है। इसके पीछे बदलते कूटनीतिक और राजनीतिक संबंध भी हैं।
भारत, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान के बीच बन रहे नए समीकरण आने वाले समय में और स्पष्ट होंगे। फिलहाल, स्पष्ट है कि इस्लामाबाद एयरपोर्ट डील का मुद्दा अब राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।